मित्रता के सरहदों से अनजान मै
कैसे जान पाउँगा मुझे जाना कहाँ तक है !
रास्ता नहीं बताया कभी उसने और
मंजिलों का पता नहीं मुझे !
जब भटकने लगता हूँ
खामोशी मुझे घेरने लगती हैं
ढूंढने लगता हूँ
उस मील के पत्थर को जो
शायद उसने रखा हो
मुझसे आगे निकल गयी जो,
एक अदद साथी की तलाश में कभी ऐसा लगा
कोई दूर आगे से पुकारता रहा
और कभी
पीछे मुड़कर बुलाना पड़ा उसे
साथ चलने की चाह में
कुछ यूँ हुआ
अपना साया ही मुझे बस अपना लगा !
पर ये नहीं जाना अब तक
ऐसा होता क्यों है!!
मैंने सुनाया था कभी उसे
वो कुल्हड़ की बातें
जो एक बार किसी के होठों को छूने के बाद
बस उसी की होकर रह जाती है
"ऐसी बाते जन्मती है वहीँ
जहाँ उसे जन्मने की सम्भावना मिले
और सम्भावना पनपती है वहीँ
जहाँ उसके घटने का जुगत दिखे"
पता नहीं ये कुल्हड़पण कब से मेरे अन्दर पनपती रही
और हर बार मेरे लिए डर का सबब बनती रही
वही डर जो बचाती रही मुझे
किसी के करीब जाने से
सोचता हूँ इस डर को गर रुसवा कर दूं
तो वो मुझे कब तक अपना बना पाएँगी !
वो भी मुझे डरपोक जानते है पर ये नहीं जानता
मै इतना डरता क्यों हूँ !
मै नहीं जानता खुद को
और ये भी नहीं जानता
मैं इतना तनहा क्यो हूँ !!