a

Tuesday, November 17, 2009

जबकि तुम नही हो...

वो रातें
जब कोई गीत सुनाते हुए
चुपके से थाम लेते थे हाथ तेरा
आँखों में एक दुसरे को देखते हुए
जाने कितनी देर तक चुपचाप
सोचा करते थे कि
तुम क्या सोच रही हो अभी...

ये रातें
जब कोई गीत गाते हुए
पहुचते आज भी है पास तेरे
अनजान तुम
जैसे आहट भी दम भरने लगे
थामना जो चाहू हाथ तेरे
ख़ुद को 'मै' ही हाथ लगे
लौटते कदमो से
भीच के ख़ुद को
ऑंखें जाने क्यो रोने लगे...

वो दिन
जब अकेले चलते हुए
मुस्कुराने लगते थे होठ मेरे
तुमसे किए गए बातों को दुहराकर,
पलक को झपकाना भी न भाता मुझे
मानो सामने तुम खड़े हो,
अनजाने मुझे देखके
मुस्कुराने लगते थे...

ये दिन
जब ढूढ़ते रहते है हर चेहरा कि
किसी में दिख जाओ तुम
चेहरे पे बमुश्किल कि हँसी
कि लोग हंस पड़ते
मुझे देखकर!
लोगो पर आती
उन दिनों की मुस्कुराहट और
आज की हँसी में
मैं बस अन्तर करते रह जाता...

Wednesday, November 4, 2009

रुको ना...

तुम्हे खोने का उतना ही गहरा अहसास
मगर जाहिर करने का कोई हुनर नही पास
.... 04th Nov 2009