तमाम निराशा के
बीच आप मुझे मिली
सुखद अचरज की तरह
मुस्कान में ठिठक गए आसू की तरह
शहरों में जब प्रेम का
आकाल पड़ा था
और भाषा में नहीं रह गया था
उत्साह का जल
आप मुझे मिली
ओंस में भींगी हुई
दूब की तरह
दूब में मंगल की
सूचना की तरह
इतनी धुप थी
की पेडों की छांव को
अप्रासंगिक बनाते हुए
इतनी चौंध
की स्वप्न के ताबीर को छितराते हुए
तुम मुझे मिली
थकन में उतरी हुई नींद की तरह
नींद में अपने प्राणों के
स्पर्श की तरह
जब समय को था संशय
इतिहास में उसे कहा होना है
जब मै आपको खोजता था
असमंजस की संध्या में नहीं
चुपचाप - शांत
उषा की लालिमा में
तुम मुझे मिली
वीरान रास्ते में
मित्र की तरह
मित्रता के सरहद पे
प्रेम की तरह....
a
Friday, November 21, 2008
तुम यहाँ कैसे!!!
मै जानता हूँ
एक दिन तुमसे बिछड़कर दूर जाना है मुझे
आज सोचता हूँ जब इस बाबत
अपने को खुद से बहुत दूर पाता हूँ
आज घंटों खुद से लिपट कर रोया हूँ!
तुम भी पढ़ी होगी
कैंटीन दीवारों पे
वो टूटी लिखाबत में लिखा गया -
"कितना खतरनाक होता है सपने का टूट जाना"
सोचता हूँ
वो दौड़ जब गुजर रहा होगा
आचानक मिल जायेंगे किसी मोड़ पर जब दोनों
नहीं कह पाउँगा, साँसे दब जायेगी
जबकि दिल से एक अनचाही आह निकलेगी
“तुम यहाँ कैसे ”!.....
एक दिन तुमसे बिछड़कर दूर जाना है मुझे
आज सोचता हूँ जब इस बाबत
अपने को खुद से बहुत दूर पाता हूँ
आज घंटों खुद से लिपट कर रोया हूँ!
तुम भी पढ़ी होगी
कैंटीन दीवारों पे
वो टूटी लिखाबत में लिखा गया -
"कितना खतरनाक होता है सपने का टूट जाना"
सोचता हूँ
वो दौड़ जब गुजर रहा होगा
आचानक मिल जायेंगे किसी मोड़ पर जब दोनों
नहीं कह पाउँगा, साँसे दब जायेगी
जबकि दिल से एक अनचाही आह निकलेगी
“तुम यहाँ कैसे ”!.....
तुम यहाँ कैसे!
वो क्षण
जब देखा था तुम्हे पहली बार
कितनी अलग दिखी थी तुम
पतझड़ में एक फूल का दिख जाना जैसे
जाने कितने दिनों से
बल्कि मुद्दतों से
मन् के किसी ‘पाक' कोने में
हुबहू तुम्हारी तरह
एक तस्बीर छुपायें रखा था
उसी पल तुम्हे देख आवाक रह गया था
रूह से फिर आवाज़ आई
“तुम यहाँ कैसे ”!
तुम्हारे साथ बीते हर एक लम्हा
सलीके से सहेज कर रखे जा रहा हूँ
कितनी ही बातें रोज़ होती है तुमसे
रोज़ की बढती जाती जज्बातों की तादाद
बमुश्किल सम्हाले जा रहा हूँ
दुहराता हूँ
समेटे हर एक बात को
जो तुम मुझसे कहती हो,
अब तन्हाई में मै 'तुम' हो जाता हूँ
कितना अच्छा लगता है
जब ऐसे में किसी मोड़ पर
तुम मिल जाती हो
जुबान अपने आप कहती है…
“तुम यहाँ कैसे”!
जब देखा था तुम्हे पहली बार
कितनी अलग दिखी थी तुम
पतझड़ में एक फूल का दिख जाना जैसे
जाने कितने दिनों से
बल्कि मुद्दतों से
मन् के किसी ‘पाक' कोने में
हुबहू तुम्हारी तरह
एक तस्बीर छुपायें रखा था
उसी पल तुम्हे देख आवाक रह गया था
रूह से फिर आवाज़ आई
“तुम यहाँ कैसे ”!
तुम्हारे साथ बीते हर एक लम्हा
सलीके से सहेज कर रखे जा रहा हूँ
कितनी ही बातें रोज़ होती है तुमसे
रोज़ की बढती जाती जज्बातों की तादाद
बमुश्किल सम्हाले जा रहा हूँ
दुहराता हूँ
समेटे हर एक बात को
जो तुम मुझसे कहती हो,
अब तन्हाई में मै 'तुम' हो जाता हूँ
कितना अच्छा लगता है
जब ऐसे में किसी मोड़ पर
तुम मिल जाती हो
जुबान अपने आप कहती है…
“तुम यहाँ कैसे”!
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