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Friday, November 21, 2008

तुम यहाँ कैसे!!!

मै जानता हूँ
एक दिन तुमसे बिछड़कर दूर जाना है मुझे
आज सोचता हूँ जब इस बाबत
अपने को खुद से बहुत दूर पाता हूँ
आज घंटों खुद से लिपट कर रोया हूँ!

तुम भी पढ़ी होगी
कैंटीन दीवारों पे
वो टूटी लिखाबत में लिखा गया -
"कितना खतरनाक होता है सपने का टूट जाना"
सोचता हूँ
वो दौड़ जब गुजर रहा होगा
आचानक मिल जायेंगे किसी मोड़ पर जब दोनों
नहीं कह पाउँगा, साँसे दब जायेगी
जबकि दिल से एक अनचाही आह निकलेगी
“तुम यहाँ कैसे ”!.....

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