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Friday, November 21, 2008

समय

तमाम निराशा के
बीच आप मुझे मिली
सुखद अचरज की तरह
मुस्कान में ठिठक गए आसू की तरह

शहरों में जब प्रेम का
आकाल पड़ा था
और भाषा में नहीं रह गया था
उत्साह का जल
आप मुझे मिली
ओंस में भींगी हुई
दूब की तरह
दूब में मंगल की
सूचना की तरह
इतनी धुप थी
की पेडों की छांव को
अप्रासंगिक बनाते हुए
इतनी चौंध
की स्वप्न के ताबीर को छितराते हुए
तुम मुझे मिली
थकन में उतरी हुई नींद की तरह
नींद में अपने प्राणों के
स्पर्श की तरह
जब समय को था संशय
इतिहास में उसे कहा होना है
जब मै आपको खोजता था
असमंजस की संध्या में नहीं
चुपचाप - शांत
उषा की लालिमा में
तुम मुझे मिली
वीरान रास्ते में
मित्र की तरह
मित्रता के सरहद पे
प्रेम की तरह....

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