वो क्षण
जब देखा था तुम्हे पहली बार
कितनी अलग दिखी थी तुम
पतझड़ में एक फूल का दिख जाना जैसे
जाने कितने दिनों से
बल्कि मुद्दतों से
मन् के किसी ‘पाक' कोने में
हुबहू तुम्हारी तरह
एक तस्बीर छुपायें रखा था
उसी पल तुम्हे देख आवाक रह गया था
रूह से फिर आवाज़ आई
“तुम यहाँ कैसे ”!
तुम्हारे साथ बीते हर एक लम्हा
सलीके से सहेज कर रखे जा रहा हूँ
कितनी ही बातें रोज़ होती है तुमसे
रोज़ की बढती जाती जज्बातों की तादाद
बमुश्किल सम्हाले जा रहा हूँ
दुहराता हूँ
समेटे हर एक बात को
जो तुम मुझसे कहती हो,
अब तन्हाई में मै 'तुम' हो जाता हूँ
कितना अच्छा लगता है
जब ऐसे में किसी मोड़ पर
तुम मिल जाती हो
जुबान अपने आप कहती है…
“तुम यहाँ कैसे”!
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