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Sunday, August 16, 2009

मित्र

मित्र वह है जिनके साथ आप जैसे है वैसे रह सकते है। उनके सामने आप की आत्मा नंगी हो सकती है। वह आपको कुछ पहन लेने को बाध्य नही करता। वह कहता है की आप जैसे हो वैसे ही आप मुझे प्रिय है। वह आपसे नही कहता की आप अब से बहतर या बदतर बने। जब आप उनके साथ है आप को उस कैदी जैसा अनुभव होता है जिसे अभी अभी निर्दोष करार दिया गया हो। उनकी गतिबिधियों के प्रति आपको चौकस रहने की आवश्कता नही। आप कुछ भी कह सकते है बशर्तें की आप वही कहते है जो बास्तव में आप है। आपके व्यक्तित्व में जो विरोधाभास है जिनके कारन आपको लोग ग़लत समझते है, उन्हें आपका मित्र समझता है। उसके साथ आप रहते हुए स्वतंत्र होकर साँस ले सकते है। उनके सामने निसंकोच होकर अपने मिथ्याभिमान, गर्व, नापसंदियो, इर्श्याओं, विसंगतियों को स्वीकार कर सकते है क्योकर इनको उनके सामने खोलकर रख देने से यह अपनेआप मित्र की वफादारी के सफ़ेद सागर में विलीन हो जाते है। उनके सामने आपको सावधान रहने की आवश्कता नही। आप उनकी निंदा और उपेक्षा कर सकते है, आप उसे बदार्श्त कर सकते है। इससे भी बढ़कर उसके समक्ष आप निश्छल, निष्चल और स्थिर रह सकते है। वह आपको जानता पहचानता है। आप उनके साथ रो सकते है गा सकते है, हंस सकते है, प्राथना कर सकते है। इनमे और इन सबके उपर वह आपको देखता, परखता, जानता और प्यार करता है। मित्र, मैं कहूँगा, मित्र वह है जिसके साथ आप वैसे ही पेश आ सकते है, जैसे आप है!!!

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