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Friday, August 14, 2009

पड़ाव

क्यों जब भी कोई बात छिड़ती है
बात वही पहुचती है
जहाँ सबों को अपनी 'वो'
याद आती है
आख़िर ये कौन सा पड़ाव है!

दुनिया की धुन में
ख़ुद को डुबाने की कोशिश
ढूढ़ते किसे है पता नही पर
ख़ुद को भुलाने की कोशिश
जब कभी तनहा पाते है...
यादें किसी दरीचा से आकर
'जहाँ' बदल देती है
फ़िर आचानक चली जाती वो
जब jahan खलल देती है
आख़िर ये कौन सा पड़ाव है!

हरेक राज उनसे छुपाये रखे है
पर क्यो कोई राज उनके सामने 'आम' हो जाती है
आचानक राह चलते हुए, सुनते हुए
कोई गीत-ग़ज़ल में
ढूढने लगते है उसे
कुछ लिखने को जब भी जी चाहा
वही तो बताने चली आती सबकुछ
फिर हरेक शब्द में
'वो' नज़र आती है
आख़िर ये कौन सा पड़ाव है!

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