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Friday, August 14, 2009

वो चौराहा...

इश्क की गलियों में
मोहबत के शहर में
प्रेम की दुनिया में
अपने आप को मैं
एक चौराहे पर पाता हूँ
वो जायेगी लेकर मुझे
वो गलिया, वो शहर वो दुनिया
ख़ुद को जानने के लिए पर
जानने से पहले,
अपने आप को आजमाने से पहले
उसकी नज़र में
ढूँढना चाहता हूँ
एक पहल
जो मुझे अहसास दिलाएं
की जब मैं चलू तो
मेरा कदम उनके छाव में हो...

4 comments:

डॉ महेश सिन्हा said...

फॉण्ट साइज़ बहुत छोटा है पढने में नहीं आता

Chandan Kumar Jha said...

सुन्दर रचना....सही में अक्षरों को थोड़ा बड़ा करें.......और ये word verification हटा दें....टिप्प्णी करने में आसानी होती है. आभार.

चिट्ठाजगत में आपका स्वागत है.......भविष्य के लिये ढेर सारी शुभकामनायें.

गुलमोहर का फूल

उम्मीद said...

आप की रचना प्रशंसा के योग्य है . आशा है आप अपने विचारो से हिंदी जगत को बहुत आगे ले जायंगे
लिखते रहिये
चिटठा जगत मे आप का स्वागत है
गार्गी

Vipin Behari Goyal said...

बहुत सुंदर
तेज धूप का सफ़र