इश्क की गलियों में
मोहबत के शहर में
प्रेम की दुनिया में
अपने आप को मैं
एक चौराहे पर पाता हूँ
वो जायेगी लेकर मुझे
वो गलिया, वो शहर वो दुनिया
ख़ुद को जानने के लिए पर
जानने से पहले,
अपने आप को आजमाने से पहले
उसकी नज़र में
ढूँढना चाहता हूँ
एक पहल
जो मुझे अहसास दिलाएं
की जब मैं चलू तो
मेरा कदम उनके छाव में हो...
a
Friday, August 14, 2009
Tuesday, December 16, 2008
कभी !!
कभी ख्वाबों की बातें करना
कभी आपको दिल तक लाना
कभी हँसी सी बातें कहकर
एकटक आपको देखे जाना !
कभी आपके सामने रहकर
आपको ही बस सोचे जाना !!
कभी ख़ुद में आपको देखना
कभी आप में मैं हो जाना
जाने क्यों रास आने लगी अब
दिल्लगी से दिल को बहलाना
किसको अब जल्दी दिखती है
दिल की बात जुवा तक लाना!!
कभी अजनबी बातें कहकर
आपके चेहरों को पढ़ जाना
कभी आपका अपना बनकर
आपके पहलु में सर को झुकाना
काश कभी ऐसा हो जाए
आपको ऐसे ही लिखते जाना...
कभी आपको दिल तक लाना
कभी हँसी सी बातें कहकर
एकटक आपको देखे जाना !
कभी आपके सामने रहकर
आपको ही बस सोचे जाना !!
कभी ख़ुद में आपको देखना
कभी आप में मैं हो जाना
जाने क्यों रास आने लगी अब
दिल्लगी से दिल को बहलाना
किसको अब जल्दी दिखती है
दिल की बात जुवा तक लाना!!
कभी अजनबी बातें कहकर
आपके चेहरों को पढ़ जाना
कभी आपका अपना बनकर
आपके पहलु में सर को झुकाना
काश कभी ऐसा हो जाए
आपको ऐसे ही लिखते जाना...
Saturday, December 6, 2008
आ भी जाओ!
नही, बस और नही बुलाऊंगा मै
कहूँ, तुम याद नही आते तो झूठा कहलाऊंगा मैं!
हर बार बह जाते है गुस्सैल लहरों में
अब रेत पर घर नही बनाऊंगा मैं!
तुम भी तोकभी बढाओ पहला कदम
अब न पहल कर पाउँगा मै!
कह दो तुम्हे नही है इंतज़ार मेरा
ये झूठ तो न कह पाउँगा मैं!
कतरा भर जिंदगी जीभर लूँ जरा
गर और मिली तो खुशी से मर ही जाऊंगा मै!
क्यो हो तुम खामोश खडे
आ जाओ, आ भी जाओ, अब न चल पाउँगा मै!!
कहूँ, तुम याद नही आते तो झूठा कहलाऊंगा मैं!
हर बार बह जाते है गुस्सैल लहरों में
अब रेत पर घर नही बनाऊंगा मैं!
तुम भी तोकभी बढाओ पहला कदम
अब न पहल कर पाउँगा मै!
कह दो तुम्हे नही है इंतज़ार मेरा
ये झूठ तो न कह पाउँगा मैं!
कतरा भर जिंदगी जीभर लूँ जरा
गर और मिली तो खुशी से मर ही जाऊंगा मै!
क्यो हो तुम खामोश खडे
आ जाओ, आ भी जाओ, अब न चल पाउँगा मै!!
गम !
तुमसे दूर जाने का गम ही तो है मुझे
जो पास आने की इजाज़त नही देता!
बिछड़ जाने का डर ही तो है मुझे
जो मिलने की इजाज़त नही देता!
पर ये कमबक्त दिल समझता नही
भूल जाने की इजाज़त नही देता!
जो पास आने की इजाज़त नही देता!
बिछड़ जाने का डर ही तो है मुझे
जो मिलने की इजाज़त नही देता!
पर ये कमबक्त दिल समझता नही
भूल जाने की इजाज़त नही देता!
तुम अनछुई सी !
तुम अनछुई सी, एक कुल्हड़ जैसी
जो एक बार होंठो से छुए जाने पर,
किसी से चूमे जाने के बाद
आखिरी साँस तक बस उसी की हो चली!
और वो मेम चीनी मिटटी के कप जैसी
जो एक के होंठों से लगने के बाद,
फिर एक बार धुलकर, सजकर है तैयार
किसी और के आगोश में जाने को !!
जो एक बार होंठो से छुए जाने पर,
किसी से चूमे जाने के बाद
आखिरी साँस तक बस उसी की हो चली!
और वो मेम चीनी मिटटी के कप जैसी
जो एक के होंठों से लगने के बाद,
फिर एक बार धुलकर, सजकर है तैयार
किसी और के आगोश में जाने को !!
Friday, November 21, 2008
समय
तमाम निराशा के
बीच आप मुझे मिली
सुखद अचरज की तरह
मुस्कान में ठिठक गए आसू की तरह
शहरों में जब प्रेम का
आकाल पड़ा था
और भाषा में नहीं रह गया था
उत्साह का जल
आप मुझे मिली
ओंस में भींगी हुई
दूब की तरह
दूब में मंगल की
सूचना की तरह
इतनी धुप थी
की पेडों की छांव को
अप्रासंगिक बनाते हुए
इतनी चौंध
की स्वप्न के ताबीर को छितराते हुए
तुम मुझे मिली
थकन में उतरी हुई नींद की तरह
नींद में अपने प्राणों के
स्पर्श की तरह
जब समय को था संशय
इतिहास में उसे कहा होना है
जब मै आपको खोजता था
असमंजस की संध्या में नहीं
चुपचाप - शांत
उषा की लालिमा में
तुम मुझे मिली
वीरान रास्ते में
मित्र की तरह
मित्रता के सरहद पे
प्रेम की तरह....
बीच आप मुझे मिली
सुखद अचरज की तरह
मुस्कान में ठिठक गए आसू की तरह
शहरों में जब प्रेम का
आकाल पड़ा था
और भाषा में नहीं रह गया था
उत्साह का जल
आप मुझे मिली
ओंस में भींगी हुई
दूब की तरह
दूब में मंगल की
सूचना की तरह
इतनी धुप थी
की पेडों की छांव को
अप्रासंगिक बनाते हुए
इतनी चौंध
की स्वप्न के ताबीर को छितराते हुए
तुम मुझे मिली
थकन में उतरी हुई नींद की तरह
नींद में अपने प्राणों के
स्पर्श की तरह
जब समय को था संशय
इतिहास में उसे कहा होना है
जब मै आपको खोजता था
असमंजस की संध्या में नहीं
चुपचाप - शांत
उषा की लालिमा में
तुम मुझे मिली
वीरान रास्ते में
मित्र की तरह
मित्रता के सरहद पे
प्रेम की तरह....
तुम यहाँ कैसे!!!
मै जानता हूँ
एक दिन तुमसे बिछड़कर दूर जाना है मुझे
आज सोचता हूँ जब इस बाबत
अपने को खुद से बहुत दूर पाता हूँ
आज घंटों खुद से लिपट कर रोया हूँ!
तुम भी पढ़ी होगी
कैंटीन दीवारों पे
वो टूटी लिखाबत में लिखा गया -
"कितना खतरनाक होता है सपने का टूट जाना"
सोचता हूँ
वो दौड़ जब गुजर रहा होगा
आचानक मिल जायेंगे किसी मोड़ पर जब दोनों
नहीं कह पाउँगा, साँसे दब जायेगी
जबकि दिल से एक अनचाही आह निकलेगी
“तुम यहाँ कैसे ”!.....
एक दिन तुमसे बिछड़कर दूर जाना है मुझे
आज सोचता हूँ जब इस बाबत
अपने को खुद से बहुत दूर पाता हूँ
आज घंटों खुद से लिपट कर रोया हूँ!
तुम भी पढ़ी होगी
कैंटीन दीवारों पे
वो टूटी लिखाबत में लिखा गया -
"कितना खतरनाक होता है सपने का टूट जाना"
सोचता हूँ
वो दौड़ जब गुजर रहा होगा
आचानक मिल जायेंगे किसी मोड़ पर जब दोनों
नहीं कह पाउँगा, साँसे दब जायेगी
जबकि दिल से एक अनचाही आह निकलेगी
“तुम यहाँ कैसे ”!.....
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